दुर्गेश साहू धमतरी। नगर पालिक निगम धमतरी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर प्रस्तावित मटकी फोड़ कार्यक्रम अब धार्मिक आयोजन से ज्यादा निगम की अंदरूनी खींचतान का मुद्दा बन गया है। वर्षों से सामाजिक संगठनों और शहर के युवाओं द्वारा घड़ी चौक में आयोजित किए जा रहे दही-हांडी कार्यक्रम के बीच नगर निगम ने 4 सितंबर को इसी स्थल पर अपने स्तर पर आयोजन कराने का निर्णय लिया है। फैसले के बाद जहां संगठन ने आपत्ति जताई है, वहीं अब निगम के भीतर से ही इस निर्णय पर सवाल उठने लगे हैं। मामला तब और गंभीर हो गया, जब निगम की ओर से जारी जानकारी में कार्यक्रम को महापौर, आयुक्त, सभापति और एमआईसी सदस्यों की सर्वसम्मति से मंजूरी मिलने की बात कही गई। इसके बाद निगम सभापति कौशल्या देवांगन ने इस दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मटकी फोड़ आयोजन को लेकर कोई आधिकारिक एमआईसी बैठक नहीं हुई और उन्होंने ऐसी कोई सहमति नहीं दी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निगम कार्यालय में उनकी मौजूदगी शहर के अन्य मुद्दों को लेकर थी। सभापति के इस बयान के बाद अब सबसे बड़ा सवाल सर्वसम्मति के दावे पर खड़ा हो गया है। आखिर जब सभापति की सहमति नहीं थी, तो सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होने की जानकारी कैसे जारी हुई? क्या निगम के भीतर ही निर्णय को लेकर तालमेल की कमी है? और वर्षों से सामाजिक संगठनों द्वारा निभाई जा रही परंपरा में निगम की सीधी एंट्री की जरूरत क्यों पड़ी?
परंपरा और निगम की पहल
श्रीराम हिंदू संगठन का कहना है कि घड़ी चौक में दही-हांडी का आयोजन वह पिछले 12 वर्षों से करता आ रहा है और इस बार 13वां आयोजन भी संगठन ही करेगा। संगठन ने निगम के कार्यक्रम का विरोध करते हुए कहा है कि निगम चाहे तो सहयोग करे, लेकिन वर्षों से चले आ रहे आयोजन की जगह और परंपरा में हस्तक्षेप न किया जाए। दूसरी ओर निगम का तर्क है कि शहर के विकास के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को भी बढ़ावा देना उसकी जिम्मेदारी है। यानी एक तरफ 12 साल पुरानी परंपरा, दूसरी तरफ निगम की नई पहल, और दोनों के बीच घड़ी चौक का आयोजन अब विवाद के केंद्र में है।
जनता के सवाल भी कम नहीं
शहर में इस विवाद के साथ निगम की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठ रहे हैं। सड़कों की बदहाली, सफाई और मच्छर नियंत्रण जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में नागरिकों का सवाल है कि जब मूलभूत सुविधाओं से जुड़े कई मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं, तब निगम का ध्यान धार्मिक आयोजन पर केंद्रित करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? मामले का दूसरा पहलू निगम की वित्तीय स्थिति से जुड़ा है। पिछले वर्षों के कुछ आयोजन से जुड़े कर्मचारियों, ठेकेदारों और पेट्रोल पंप संचालक के भुगतान लंबित होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में मटकी फोड़ आयोजन का खर्च किस मद से और किस बजट प्रावधान के तहत किया जाएगा, यह सवाल भी उठ रहा है। अब सवाल सिर्फ मटकी फोड़ प्रतियोगिता का नहीं रह गया है। निगम के फैसले, सर्वसम्मति के दावे पर सभापति की आपत्ति, 12 साल पुरानी परंपरा और आयोजन के खर्च को लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक बहस में बदल दिया है। देखना होगा कि प्रशासन दोनों पक्षों के बीच क्या रास्ता निकालता है और घड़ी चौक पर इस बार मटकी फूटती है या निगम और संगठन के बीच मतभेद और गहराते हैं।

0 Comments